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Essay On My Parents In Hindi

Dear Maa & Papa,

THANK YOU! How simple it is to type this on a piece of paper. Yet it is so difficult to tell you, the same two words in person. Why? The question is not why. The question is for what? 

What do I start thanking you for? 

For the time I was sick and was crying all night, Maa you gave up your sleep and sat all night nursing me. Soaking the towel in ice water and placing it on my head, waiting for the fever to die down. 

The time Papa, you came back late from work after a long tiring day, yet you went off to get my school supplies without cribbing. Papa, every time I asked you for a certain amount of money, you would give me more than what I asked for, with that perfect smile of yours. 

You both are an epitome of compassion, hard work and determination. I have learnt these 3 qualities by watching you during your trying times. 

Maa, you were lying on the bed sick, yet the first thing you asked me when I returned from school was, “Did you finish your lunch?” When I said no, you frowned at me and got up from the bed, heading towards the kitchen. 

Papa, you tend to always project your tough emotionless exterior, but the minute you know I need to be dropped somewhere, you come back early from work. From party planning to vacation planning, you never fail to impress me with your management skills.


I am truly blessed to be the daughter of a perfect set of Indian parents. But yes, now that I have reached an age where I would like to request you few things from the bottom of my heart. 

I humbly ask you to open up to me, talk unhesitatingly about “Taboo Topics” such as Sex, Menstruation, Boyfriends, Love, Marriage, Drinking and many others, which we never discuss openly.

Yes, I know it must be supremely uncomfortable for you and it will be the same for me. But isn’t it better that these subjects are addressed in a cohesive environment from the right sources?  

Maa, Papa, I have come of age where I demand reasons for your actions.

As a child, you just told me what is good or bad. What is black or white? But the time has come, when I ask you WHY?? Why do you say it is good and why do you say it is bad? Why must I do this? And why mustn’t I? 

Guide me through my journey. But please do not cave the path for me.

I would like the freedom to make my own decisions and the opportunity to make my own path, no matter how hard it may be. Our neighbours, Chacha-Chachi, Mama-Mami, would keep telling you the things that I need to do to come up in my life. I humbly appeal to you, to first ask me, what I want to do in my life.

I am 100% unique and the last edition of my kind.So please do not compare my results to those of my peers. 

I have always worked hard to gain knowledge rather than to rote learn for the sake of my marks. I may not be good at byhearting theories and definitions. But I do know how to apply my skills in the right field. I may not be good at Science or Mathematics, but there is a hidden artist or writer in me who is waiting to unleash her creativity.

I will put in the best of my efforts in the field I am truly passionate about. And you will raise your head with pride and tell me, that you are proud of me with those beautiful eyes glistening with moisture. 

I know that there is nothing that I can do to repay all that you have done for me, right from my birth. But I will be that human being who will make a difference in not only your life but in the lives of many.

Your Loving Daughter.

Sanjana Shenoy

Sanjana Shenoy is a volunteer at YourDOST. She is a student at Christ University and loves to keep herself busy with art, writing and dance. She believes that every little problem can be solved by sharing with people. Through YourDOST she wants to reach and inspire people to always see the brighter side of a situation

बच्चों का माता-पिता के प्रति कर्तव्य पर निबंध |Essay on Children’s Duty towards Parents in Hindi!

मनुष्य का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों से होकर गुजरता है । उसकी नवजात शिशु अवस्था से लेकर विद्‌यार्थी जीवन, फिर गृहस्थ जीवन तत्पश्चात् मृत्यु तक वह अनेक प्रकार के अनुभवों से गुजरता है ।

अपने जीवन में वह अनेक प्रकार के कार्यों व उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है । परंतु अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य व उत्तरदायित्वों को वह जीवन पर्यत नहीं चुका सकता है । माता-पिता से संतान को जो कुछ भी प्राप्त होता है वह अमूल्य है । माँ की ममता व स्नेह तथा पिता का अनुशासन किसी भी मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे प्रमुख भूमिका रखते हैं ।

किसी भी मनुष्य को उसके जन्म से लेकर उसे अपने पैरों तक खड़ा करने में माता-पिता को किन-किन कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है इसका वास्तविक अनुमान संभवत: स्वयं माता या पिता बनने के उपरांत ही लगाया जा सकता है । हिंदू शास्त्रों व वेदों के अनुसार मनुष्य को 84 लाख योनियो के पश्चात् मानव शरीर प्राप्त होता है । इस दृष्टि से माता-पिता सदैव पूजनीय होते हैं जिनके कारण हमें यह दुर्लभ मानव शरीर की प्राप्ति हुई ।

आज संसार में यदि हमारा कुछ भी अस्तित्व है या हमारी इस जगत में कोई पहचान है तो उसका संपूर्ण श्रेय हमारे माता-पिता को ही जाता है । यही कारण है कि भारत के आदर्श पुरुषों में से एक राम ने माता-पिता के एक इशारे पर युवराज पद का मोह त्याग दिया और वन चले गए ।

कितने कष्टों को सहकर माता पुत्र को जन्म देती है, उसके पश्चात् अपने स्नेह रूपी अमृत से सींचकर उसे बड़ा करती है । माता-पिता के स्नेह व दुलार से बालक उन संवेदनाओं को आत्मसात् करता है जिससे उसे मानसिक बल प्राप्त होता है ।

हमारी अनेक गलतियों व अपराधों को वे कष्ट सहते हुए भी क्षमा करते हैं और सदैव हमारे हितों को ध्यान में रखते हुए सद्‌मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करते हैं । पिता का अनुशासन हमें कुसंगति के मार्ग पर चलने से रोकता है एवं सदैव विकास व प्रगति के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है ।

यदि कोई डॉक्टर, इंजीनियर व उच्च पदों पर आसीन होता है तो उसके पीछे उसके माता-पिता का त्याग, बलिदान व उनकी प्रेरणा की शक्ति निहित होती है । यदि प्रांरभ से ही माता-पिता से उसे सही सीख व प्ररेणा नहीं मिली होती तो संभवत: समाज में उसे वह प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त नहीं होता ।

अत: हम जीवन पथ पर चाहे किसी भी ऊँचाई पर पहुँचें हमें कभी भी अपने माता-पिता के सहयोग, उनके त्याग और बलिदान को नहीं भूलना चाहिए । हमारी खुशियों व उन्नति के पीछे हमारे माता-पिता की अनगिनत खुशियों का परित्याग निहित होता है । अत: हमारा यह परम दायित्व बनता है कि हम उन्हें पूर्ण सम्मान प्रदान करें और जहाँ तक संभव हो सके खुशियाँ प्रदान करने की चेष्टा करें ।

माता-पिता की सदैव यही हार्दिक इच्छा होती है कि पुत्र बड़ा होकर उनके नाम को गौरवान्वित करे । अत: हम सबका उनके प्रति यह दायित्व बनता है कि हम अपनी लगन, मेहनत और परिश्रम के द्‌वारा उच्चकोटि का कार्य करें जिससे हमारे माता-पिता का नाम गौरवान्वित हो । हम सदैव यह ध्यान रखें कि हमसे ऐसा कोई भी गलत कार्य न हो जिससे उन्हें लोगों के सम्मुख शर्मिंदा होना पड़े ।

आज की भौतिकवादी पीढ़ी में विवाहोपरांत युवक अपने निजी स्वार्थों में इतना लिप्त हो जाते हैं कि वे अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा तो दूर अपितु उनकी उपेक्षा करना प्रारंभ कर देते हैं । यह निस्संदेह एक निंदनीय कृत्य है । उनके कर्मों व संस्कार का प्रभाव भावी पीढ़ी पर पड़ता है । यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है । टूटते घर-परिवार व समाज सब इसी अलगाववादी दृष्टिकोण के दुष्परिणाम हैं ।

अत: जीपन पर्यंत मनुष्य को अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों व उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना चाहिए । माता-पिता की सेवा सच्ची सेवा है । उनकी सेवा से बढ़कर दूसरा कोई पुण्य कार्य नहीं है । हमारे वैदिक ग्रंथों में इन्हीं कारणों से माता को देवी के समकक्ष माना गया है ।

माता-पिता की सेवा द्‌वारा प्राप्त उनके आशीर्वाद से मनुष्य जो आत्म संतुष्टि प्राप्त करता है वह समस्त भौतिक सुखों से भी श्रेष्ठ है । ”मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” वाली वैदिक अवधारणा को एक बार फिर से प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है ताकि हमारे देश का गौरव अक्षुण्ण बना रहे ।

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